
भुवः लोक (मध्य लोक – सौरमण्डल) से सम्बन्धित चार भाव हैं – सुत (५वाँ) जिसका अर्थ है सन्तान, शत्रु (६ठा), दारा (७वाँ) तथा मृत्यु (८वाँ)। इन शब्दों के अर्थ को भलीभाँति समझ लें, अन्यथा आप इन भावों का वास्तविक अर्थ कभी नहीं समझ पाएँगे। यह जानना अत्यन्त आवश्यक है कि जब किसी भाव का स्वामी किसी अन्य भाव में स्थित होता है, तब उसके फल कैसे विचारने चाहिए। भावेश (भाव का स्वामी) ही उस भाव का वास्तविक कर्ता (कर्ता) होता है। यदि वह (a) लग्न से तथा (b) उस भाव से शुभ स्थान पर स्थित हो, तो सामान्यतः (a) जातक के अनुभव के रूप में तथा (b) उस भाव की अभिव्यक्ति के रूप में शुभ फल प्रदान करता है। इसी प्रकार भावेश के अध्ययन के सिद्धान्तों को सीखें।
सुतेशः – पंचम भाव का स्वामी
पंचम भाव के स्वामी की विभिन्न भावों में स्थिति एवं ऐसे भावेश के स्थान से सम्बन्धित सिद्धान्तों का अध्ययन।
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षष्ठेशः – षष्ठ भाव का स्वामी
छठे भाव के स्वामी की स्थिति से सम्बन्धित फल।
दारेशः – सप्तम भाव का स्वामी
सप्तम भाव (पति/पत्नी, साझेदारी) के स्वामी की स्थिति से सम्बन्धित फल। यह अत्यन्त महत्वपूर्ण केन्द्र भाव है जिसका कारक शुक्र है, जो हमारे प्रेम को दर्शाता है। यह हृदय का आसन है, क्योंकि यह हमारे अन्तःस्थ इच्छाओं को दर्शाता है।
अष्टमेशः – अष्टम भाव का स्वामी
अष्टम भाव (मृत्यु, पीड़ा, शाप, रोग तथा समस्त प्रकार के दुःख) के स्वामी की स्थिति से सम्बन्धित फल।




