भुवः लोक (मध्य लोक – सौरमण्डल) से सम्बन्धित चार भाव हैं – सुत (५वाँ) जिसका अर्थ है सन्तान, शत्रु (६ठा), दारा (७वाँ) तथा मृत्यु (८वाँ)। इन शब्दों के अर्थ को भलीभाँति समझ लें, अन्यथा आप इन भावों का वास्तविक अर्थ कभी नहीं समझ पाएँगे। यह जानना अत्यन्त आवश्यक है कि जब किसी भाव का स्वामी किसी अन्य भाव में स्थित होता है, तब उसके फल कैसे विचारने चाहिए।
भू लोक (पृथ्वी लोक) से संबंधित चार भाव लग्न (प्रथम), धन (द्वितीय), सहज (तृतीय) और सुख (चतुर्थ) हैं। इन शब्दों के अर्थ अच्छी तरह से समझ लें, अन्यथा आप इन भावों का अर्थ कभी नहीं समझ पाएँगे। जब किसी भाव का स्वामी किसी भी भाव में स्थित हो, तो भाव के परिणामों का आकलन करने के सिद्धांतों को समझना महत्वपूर्ण है। भावेश (भाव का स्वामी) उस भाव (भाव) का वास्तविक कर्ता होता है। यदि यह (क) लग्न और (ख) उस भाव से अच्छी स्थिति में हो, तो यह आमतौर पर क्रमशः (क) जातक के लिए एक अनुभव और (ख) भाव की अभिव्यक्ति के रूप में अच्छे परिणाम देता है।
पं. संजय रथ । ज्योतिष गुरु
संजय रथ (उड़िया: ସଞୟ ରଥ) पुरी के ज्योतिषियों के एक पारंपरिक परिवार से आते हैं, जिसका वंश श्री अच्युत दास (अच्युतानंद) से जुड़ा है। संजय रथ ज्योतिष की नींव के रूप में बृहत पाराशर होराशास्त्र, जैमिनी उपदेश सूत्र, बृहत जातक और कल्याणवर्मा की सारावली का उपयोग करते हैं और विभिन्न अन्य ज्योतिष शास्त्रों से शिक्षा देते हैं। उनकी समग्र शिक्षा और लेखन विभिन्न विचारधाराओं में फैले हुए हैं, हालांकि उन्होंने ज्योतिष का अपना ब्रांड नहीं बनाया है।